राजनीति का गिरता स्तर | Opinion | Indian Politics

आज की राजनीति का गिरता स्तर सचमुच गहरी चिंता का विषय है| आज सत्ता पक्ष हो या विरोधी दल के नेता दोनों की ही जुबान बुरी तरह से फिसलने लगी है या यूं कहें की जानबूझकर ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है।

आज के कुछ नेता चुनावों  के आते ही बयान बाजी  शुरू कर देते हैं और उसमें भी  मानो कोई  कंपटीशन चल रहा हो की कौन किसको कितना अपमानित कर सकता है

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष एक दूसरे को अपमानित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ते हैं।

आज हमारे  नेता हमारे देश के अहम मुद्दों को छोड़कर एक दूसरे पर निजी हमले करने में लगे हुए हैं

आजकल हमारे देश के कुछ नेता हर चुनाव प्रचार में हमारे देश की मूलभूत जरूरतों की बात कम करते हैं और एक दूसरे पर निजी हमले ज्यादा करते हैं|

आज हमारे देश के लिए क्या ज्यादा महत्वपूर्ण है?  पीने के लिए साफ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार,गरीबो के लीये घर किसानों को अपनी फसलों की सही कीमत मिले, भ्रष्टाचार से  मुक्ति, इत्यादि।

लेकिन आज हमारे नेता इन सारे विषयओ पर बात करने के बजाय एक दूसरे के धर्म  और जाति की प्रामाणिकता बताने मैं लगे रहते है, आजकल जुमलेबाजी  वाली राजनीति  भी खूब हो रही है। जैसे की नामदार वर्सेस कामदार, शहजादे, सूट बूट की सरकार इत्यादि।

अब तो राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि भगवान तक को नहीं छोड़ा उन्हें भी अपनी गंदी राजनीति में लेकर गए हैं| हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवी नेता अब भगवान की जाति और उनका धर्म भी बताने लगे हैं, कितनी शर्म की बात है।

पहले जब कभी कबार छोटेमोटे नेताओं की जुबान फिसलती थी तो बड़े नेता उन्हें डांट दिया करते थे

लेकिन अब तो बड़े नेता ही अपने बड़बोले पन के चलते सामान्य शिष्टाचार को तिलांजलि देते नजर आते हैं|

आज देश में एक ऐसा माहोल बना दिया गया है  की यदि आप  सत्ताधारी पक्ष के  विचारों का  समर्थन करते हो और उनके द्वारा किये कामों की प्रशंसा करते हो तो आप सच्चे  देशभक्तों हो। और यदि आप सत्ताधारी पक्ष से चुनाव के दौरान उनके किए हुए वादों पर उनसे सवाल पूछते हो या उनके कार्यकाल में जल्दबाजी में लिए हुए फेसलो का विरोध करते हो तो आप देश विरोधी मान लिए जाते हो।

राजनीति में विरोध दर्शाना और अपने पक्ष की बात करना सामान्य प्रतिक्रिया है। लेकिन क्या ऐसा करने के लिए एक दूसरे का अपमान करना जरूरी है ?

अपनी बात सामान्य तरीके से शालीनता पूर्वक भी तो की जा सकती है।

एक दौर था जब विपक्षी दलों के प्रति भी बेहद आदर एवं सम्मान सूचक शब्दों का प्रयोग किया जाता था।

अटल जी इस मामले में सबसे आगे थे| चाहे वो जनसंघ रहा हो या फिर भाजपा अटल जी ने कभी नेहरू गांधी के परिवार के किसी भी सदस्य की किसी भी पब्लिक मीटिंग में कभी आलोचना नहीं की वह अपने विरोधियों का भी बहुत सम्मान करते थे।

 एक बार ऐसा हुआ कि अटल जी को अपने इलाज के लिए अमेरिका जाना था, जब यह बात राजीव गांधी को पता चली तो उन्होंने अटल जी को  एक संसदीय दल का नेता बनाकर अमेरिका भिजवा दिया। अटल जी अक्सर इस घटना का अनौपचारिक वार्ताओं में भी उल्लेख करते थे।

अगर सत्ता पक्ष और विपक्ष के कुछ नेता अटल जी के ऐसे व्यक्तित्व से थोड़ी बहुत भी सीख ले लेते तो आज राजनीति का जो हाल है  वैसा ना होता।

“आज हर कोई यहां किसी ना किसी पार्टी के विचारों का हे गुलाम
जनता जो पूछे कोई सवाल, तो नेता क्यों करें बवाल,
जनता हो रही है बेहाल, तो नेता बन रहे हैं मालामाल,
इसलिए भारत की राजनीति का हे ऐसा बुरा हाल ।“
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